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इंडिगो की फ्लाइट को लगा 1 अरब वोल्ट का झटका और टूट गई नाक, कैसे इस तकनीक ने बचा ली जिंदगियां?

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पटना से लखनऊ आ रही इंडिगो की फ्लाइट में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब विमान का अगला हिस्सा आकाशीय बिजली गिरने के कारण क्षतिग्रस्त हो गया. पटना से लखनऊ जा रही इंडिगो की एक फ्लाइट में 104 यात्री और छह क्रू मेंबर सवार थे. जब यह विमान हवा में था, तभी एक डरावनी घटना का शिकार हो गई. 17,000 फीट की ऊंचाई पर विमान पर जबरदस्त आसमानी बिजली गिरी. खराब मौसम के बीच नीचे उतरते समय बिजली गिरने से जेट का नोज कोन यानी अगला हिस्सा पिचक गया.

विमान का अगला हिस्सा पिचकने के बाद चौधरी चरण सिंह इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उसकी इमरजेंसी लैंडिंग हुई. राहत की बात यह रही कि विमान सुरक्षित उतर गया और किसी को कोई चोट नहीं आई. इस घटना ने एक बार फिर उस इंजीनियरिंग तकनीक को सामने ला दिया, जो कमर्शियल विमानों को आकाशी बिजली गिरने जैसी बेहद खतरनाक घटनाओं में भी सुरक्षित रखने में मदद करती है.
फैराडे केज सिद्धांत: जेट में धमाका क्यों नहीं होता
दरअसल, कमर्शियल एयरलाइनर फैराडे केज के सिद्धांतों पर बनाए जाते हैं. यह एक लगातार चलने वाला कंडक्टिव यानी बिजली का सुचालक खोल होता है. यह बिजली के चार्ज को विमान की बॉडी (फ्यूजलेज) की बाहरी सतह के साथ-साथ आगे बढ़ाता है. जब किसी प्लेन पर बिजली गिरती है, जिसमें अरबों वोल्ट की बिजली होती है, तो चार्ज नोज कोन या विंगटिप जैसे बाहरी हिस्से से अंदर आता है. फिर यह बाहरी धातु की सतह या उसमें लगी कॉपर फॉयल जाली के चारों ओर बहता है और आखिर में पिछले किनारों पर लगे स्टैटिक डिस्चार्जर विक्स के जरिए सुरक्षित रूप से बाहर निकल जाता है.
विमान की यह चालक बाहरी परत अंदर मौजूद केबिन को विद्युत धारा से बचाती है. इससे संवेदनशील एवियोनिक्स, ईंधन टैंक और यात्रियों तक बिजली का खतरनाक असर नहीं पहुंचता.
रेडोम पर ही मुख्य झटका क्यों लगा
विमान के अगले हिस्से में लगे नोज कोन को तकनीकी भाषा में ‘रेडोम’ कहा जाता है. आसमान में बिजली गिरने की स्थिति में यह विमान का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है. फ्यूजलेज के बाकी हिस्से में धातु की मिश्रधातु या कॉम्पोजिट मटेरियल के साथ कॉपर की चालक जाली का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन ‘रेडोम’ को गैर-धातु वाले फाइबरग्लास या कॉम्पोजिट मटेरियल से बनाया जाता है.
इसकी एक खास वजह है. विमान का मौसम रडार सीधे नोज कोन के अंदर लगा होता है. अगर नोज के आसपास धातु की परत लगा दी जाए, तो वह माइक्रोवेव रडार सिग्नल को रोक देगी. ऐसे में पायलटों को तूफानी बादलों और खराब मौसम का सही अंदाजा नहीं लग पाएगा.
चूंकि ‘रेडोम’ में विमान के बाकी हिस्से जैसी लगातार चालक बाहरी परत नहीं होती, इसलिए सीधे बिजली गिरने पर इसके एक हिस्से में तेज गर्मी से नुकसान, संरचनात्मक टूट-फूट या सतह पर छेद हो सकता है. इसके बाद विद्युत आर्क विमान के मुख्य चालक हिस्से में ट्रांसफर हो जाता है.
सुरक्षित लैंडिंग के बाद कड़ी जांच
लखनऊ में सुरक्षित लैंडिंग के बाद विमान को विस्तृत जांच के लिए ग्राउंड कर दिया गया. ग्राउंड इंजीनियर विमान की आंतरिक वायरिंग की स्थिति की जांच करते हैं. क्षतिग्रस्त ‘रेडोम’ को बदलते हैं और स्टैटिक डिस्चार्जर विक्स की भी जांच की जाती है. नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने भी मामले की अनिवार्य जांच शुरू की है. जांच और जरूरी तकनीकी मंजूरी के बाद ही विमान को दोबारा यात्री सेवा में शामिल किया जा सकेगा. इस घटना से प्रभावित सभी यात्रियों को अहमदाबाद जाने वाली दूसरी फ्लाइट में भेज दिया गया.