IMF के निवर्तमान मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गोरिन्शा का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का असर केवल नई तकनीकों तक सीमित नहीं है. AI से जुड़ी कंपनियों में तेजी से निवेश होने के कारण उनके शेयरों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. इससे निवेशकों के पोर्टफोलियो और रिटायरमेंट फंड का मूल्य भी बढ़ा है. जब लोगों को अपनी आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर महसूस होती है, तो वे यात्रा, घर, महंगी वस्तुओं और अन्य बड़े खर्च करने के लिए अधिक तैयार हो जाते हैं. यही बढ़ती मांग आगे चलकर महंगाई को बढ़ाने का कारण बन सकती है.
सिर्फ चिप की कमी नहीं, मांग भी बढ़ा रही महंगाई
IMF का मानना है कि AI महंगाई को दो अलग-अलग रास्तों से प्रभावित कर रहा है. पहला असर सप्लाई चेन पर पड़ रहा है, जहां डेटा सेंटर और एडवांस कंप्यूटिंग सिस्टम के लिए सेमीकंडक्टर, मेमोरी और स्टोरेज जैसे जरूरी उपकरणों की मांग तेजी से बढ़ रही है. इससे इन उत्पादों की लागत बढ़ रही है. दूसरा असर उपभोक्ताओं की मांग पर पड़ रहा है. जब लोगों के निवेश का मूल्य बढ़ता है, तो वे अधिक खर्च करते हैं. सप्लाई और डिमांड दोनों तरफ से पैदा हो रहा यह दबाव कीमतों को ऊपर ले जाने में योगदान दे सकता है.
टेक कंपनियों के फैसले भी दे रहे संकेत
हाल के दिनों में कई बड़ी टेक कंपनियों के फैसलों ने भी इस बदलाव की ओर इशारा किया है. बढ़ती मांग और उत्पादन लागत के कारण कुछ कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की है. विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा सेंटरों के तेजी से विस्तार के चलते मेमोरी और स्टोरेज उपकरण महंगे हो रहे हैं, जिसका असर इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ रहा है. यदि AI से जुड़ा निवेश इसी गति से बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में तकनीकी उत्पादों के साथ-साथ दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है.




