जिले के सिकरारा ब्लॉक स्थित देहजुरी गांव के रहने वाले प्रो. कृष्ण कुमार यादव ने अपनी मेहनत और शोध के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है. पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले प्रो. यादव का विश्व के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की प्रतिष्ठित सूची में लगातार पांचवीं बार चयन हुआ है. खास बात यह है कि इस बार उनका चयन सिंगल ईयर डेटाबेस के साथ-साथ करियर आधारित सूची में भी पहली बार हुआ है. उनकी इस उपलब्धि से जिले और पूर्वांचल का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन हुआ है.
सूची स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से जारी
प्रो. कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि यह प्रतिष्ठित सूची स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से जारी की जाती है और एल्सेवियर द्वारा प्रकाशित होती है. इसमें वैज्ञानिकों के शोध प्रकाशनों, साइटेशन और अन्य निर्धारित मानकों के आधार पर चयन किया जाता है. लगातार बेहतर प्रदर्शन के कारण उनकी रैंकिंग में भी सुधार हुआ है. अपने शोध विषय से संबंधित उपक्षेत्र में वह दुनिया भर में करीब 500वीं रैंक के आसपास पहुंच चुके हैं.
प्रो. कृष्ण कुमार यादव की शुरुआती शिक्षा जौनपुर में ही हुई. उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई आजू राय इंटर कॉलेज, सिरमा और इंटरमीडिएट किसान आदर्श राष्ट्रीय इंटर कॉलेज, प्रतापगंज से पूरी की. इसके बाद सिया डिग्री कॉलेज से बीएससी किया और वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में एमएससी की डिग्री हासिल की. आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से एमफिल और पीएचडी पूरी की.
थाईलैंड की यूनीवर्सिटी से किए रिसर्च
वर्ष 2020 में पीएचडी पूरी करने के तुरंत बाद उन्होंने थाईलैंड की प्रिंस ऑफ सोंगक्ला यूनिवर्सिटी में दो साल तक पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च की. इसके बाद तीन साल तक अल-ऐन यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में काम किया. प्रो. यादव का शोध मुख्य रूप से पर्यावरण विज्ञान से जुड़ा है. इसमें कचरे से ऊर्जा उत्पादन, जैविक प्रदूषण, बायो-रेमेडिएशन, जल शोधन और जल प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं. पीएचडी के दौरान उन्होंने आगरा के भूजल पर शोध किया था. उनके अनुसार, वहां के भूजल में फ्लोराइड की समस्या के कारण पानी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुरूप पीने योग्य नहीं था. इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने पानी से फ्लोराइड हटाने की प्रक्रिया यानी डीफ्लोरीडेशन पर काम किया, ताकि पानी को शुद्ध और पीने योग्य बनाने के उपाय विकसित किए जा सकें.
प्रतिष्ठित जनरल शोध छपना होता है महत्वपूर्ण
प्रो. कृष्ण कुमार यादव का कहना है कि यह सफलता एक दिन में नहीं मिली, बल्कि करीब दस साल की लगातार मेहनत का परिणाम है. उन्होंने बताया कि किसी वैज्ञानिक की पहचान बनाने में अच्छे शोध पत्र, प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशन और शोध को मिलने वाले साइटेशन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. जब दुनिया भर के दूसरे वैज्ञानिक किसी शोध को अपनी रिसर्च में शामिल करते हैं, तब उसकी उपयोगिता और प्रभाव का पता चलता है. उन्होंने कहा कि इंटरनेट के विस्तार से शोध और संचार के अवसर बढ़े हैं. भारत में भी अब बेहतर गुणवत्ता वाले शोध पत्र प्रकाशित हो रहे हैं. अमेरिका और चीन के बाद भारत वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में तीसरे स्थान पर है.
चीन कोरिया से मिला प्रोफेसर बनने का मौका, लेकिन देश चुना
वर्तमान में प्रो. यादव मध्यांचल प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एमपीयू) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इसके साथ ही वह पारुल यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर भी जुड़े हैं. हाल ही में उनका चयन दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ जोहान्सबर्ग के पर्यावरण विज्ञान एवं सतत विकास विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में हुआ है. यहां वह अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत काम करेंगे. प्रो. यादव ने बताया कि उन्हें दक्षिण कोरिया और चीन सहित कई देशों से स्थायी एसोसिएट प्रोफेसर के पद के प्रस्ताव मिले, लेकिन वह अपने देश में रहकर काम करने को प्राथमिकता देते हैं. उनका उद्देश्य विदेश के विश्वविद्यालयों से जुड़कर अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना और उसका लाभ भारतीय संस्थानों, विद्यार्थियों तथा वैज्ञानिक शोध को देना है. उनका मानना है कि निरंतर मेहनत, गुणवत्तापूर्ण शोध और सीखने की ललक के दम पर भारतीय युवा भी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना सकते हैं.




